Wednesday, May 29, 2013

ज़िन्दगी मिलेगे ना दोबारा


एक ज़िन्दगी है जीने के लिए 
फिर डर डर के बिताये क्यूँ ?
कई रास्तें हैं चलने के लिए 
गलत राह पे समय गवाएं क्यूँ?

आज दिल की आवाज़  सुनों, 
कल शोर और भी होगा।
आज नए ख्वाब बुनों,
कल ज़िम्मेदारी का भोज भी होगा।

अन्धकार है बहुत दुनिया में
हर एक लौ अमूल्य है 
खुद को उज्जवल किये बिना 
तेरे अस्तित्व का क्या मूल्य है?.

हम सबको एक दिन राक बनकर 
मिट्टी में मिल जाना है।
फिर आग में जलने से क्यूँ डरना 
जब मरने से पहले मोक्ष पाना है?

PS: This is the first Hindi post on my blog. I don't remember whether I even wrote in Hindi after school. Having shared a Hindi poem with my friend led to a conversation in Hindi verses, which became the inspiration for the rest of this poem. In retrospect, I think when it comes to writing poetry, Hindi is a much better language than English - inherently poetic. 

1 comment:

Harjot Dhaliwal said...

Felt the same when it comes to language - Hindi does feel to be free flowing when it comes to rhythm !